कहानी- कहानी एक जाबांज पुलिस वाले की है जो कि दिन रात बढ़ते अपराध को देखकर खिन्न है कुपित है। उसे मौका मिलता है तो वो एक ड्रग डीलर को पकड़ देता है लेकिन कानून से ऊपर हमेशा कुछ ना कुछ होता है और वही उसे छुड़ाने की कोशिश करता है। जिसको रोकने की कोशिश में सौरभ सक्सेना बन जाता है क्राइम फाइटर।
सकारात्मक- कहानी किसी 80s की कहानी प्रतीत होती है और उसी के अनुसार आगे भी बढ़ती है। कॉमिक्स बहुत पहले प्रकाशित हुई है तो उस समय के हिसाब से कहानी ठीक है की श्रेणी में रखी जा सकती है। कहानी का मुख्य केंद्र सौरभ है तो उसी को केंद्र में रखकर ही लिखा गया है जो कि आगे के issues में उसके चरित्र निर्माण में काम आए होंगे या आ सकते हैं। ये फेनिल कॉमिक्स का दूसरी कॉमिक्स थी तो उसके हिसाब से कहानी ठीक थी। मात्र 24 पेज में सिमटने की वजह से कहानी की गति को सही ठहराया जा सकता है।
क्या किया जा सकता था- कहानी में सौरभ के क्राइम फाइटर बनने की कहानी को कुछ और फ्रेम्स दिए जा सकते थे जो कि कहानी को थोड़ा और खोल सकते थे। सौरभ की ट्रेनिंग और उसकी कुशलता का भी अगर कहीं वर्णन होता तो ये पता लगता कि आखिर वो इतनी आसानी से कैसे इतना कुशल फाइटर है। साथ ही मान सिंह क्या है और कैसे इसमें फिट बैठता है अगर इसके लिए कुछ फ्रेम जोड़े जाते तो बढ़िया रहता।
आर्ट- कॉमिक्स का आर्ट असंतुलित है जो कि कहीं पर जम रहा है तो कहीं पर एकदम ही नीचे गिर रहा है जो कि पाठक के मन में बुरा असर छोड़ देता है। एक जैसा आर्ट कॉमिक्स में बना रहे तो पाठक उससे जुड़ ही जाता है। इसमें सुधार हो सकता था।
उपसंहार- यदि आप कॉमिक्स पढ़ने के आदी हैं तो ये कॉमिक्स आपके लिए बुरा स्वाद छोड़कर जाती है। कहानी में घटनाएं इतनी जल्दी-जल्दी घटती हैं कि आप कुछ देर के लिए सोचते रह जाते हैं कि अगर ऐसे ही कहानी लिखनी थी तो सार ही पढ़ लेना चाहिए था। फिर भी किसी के लिए कॉमिक्स पब्लिश करना ही बड़ी बात होती है और इसके लिए जो जज्बा चाहिए वो अलग ही होता है।







