
ज़ालिम मंझा कॉमिक रिव्यू: क्या सच में खौफनाक है ‘सेल नंबर 9’ का सस्पेंस?
ज़ालिम मंझा (अंक 1: सेल नंबर 9)
- प्रकाशक: बुल्सआई प्रेस (Bullseye Press)
- लेखक: सुदीप मेनन
- चित्रांकन एवं रंग सज्जा: मॉरिशियो
- हिंदी रूपांतर, सुलेख एवं ग्राफिक डिजाइन: मंदार गंगोले
- संपादक: रवि राज आहूजा
अगर आप इंडियन हॉरर और एक्शन कॉमिक्स के शौकीन हैं, तो बुल्सआई प्रेस (Bullseye Press) की पेशकश ‘ज़ालिम मंझा (अंक 1: सेल नंबर 9)’ आपकी रीडिंग लिस्ट में ज़रूर होनी चाहिए। सुदीप मेनन द्वारा लिखी गई और मॉरिशियो के शानदार चित्रांकन से सजी यह कॉमिक्स हॉरर, सस्पेंस और बी-मूवी स्टाइल थ्रिल का एक बेहतरीन मिश्रण पेश करती है।
कहानी का ताना-बाना (Plot Breakdown)
कहानी की शुरुआत होती है नीना जोज़फ़ से, जो एक जॉब क्लासिफाइड विज्ञापन देखकर मानसिक रोगियों के एक दूरदराज देखभाल संस्थान (हवेली) में इंटरव्यू देने पहुँचती है। वहाँ उसका स्वागत मैनेजर मिस्टर घोष करते हैं, जो उसे हवेली के इतिहास और वहाँ रहने वाले मरीजों से रूबरू कराते हैं।
हवेली में कुछ बेहद खतरनाक मरीज कैद हैं:
- जीत (सेल नंबर 4): जिसने अपने ही परिवार और पालतू कुत्ते का बेरहमी से कत्ल कर दिया।
- दिलप्रीत कौर (सेल नंबर 8): अपने पति और बच्चे को ज़हर देने वाली कातिल।
- चिमन भाई उर्फ चंकी (सेल नंबर 10): एक अजीब बीमारी से पीड़ित मरीज, जिसने एक पुलिस अफसर की नाक चबा ली थी।
मिस्टर घोष नीना को पूरे परिसर का दौरा कराते हुए सख्त हिदायत देते हैं—“सेल नंबर 9 के पास कभी मत जाना।”
रात ढलते ही हवेली का खौफनाक सच सामने आता है। वहाँ के मरीज और रसोइया मैडम मार्था पिशाच और राक्षसी रूप में बदल जाते हैं। जान बचाकर भागती नीना अनजाने में उसी पाबंदी वाले सेल नंबर 9 के सामने पहुँच जाती है, जहाँ भारी बेड़ियों में जकड़ा हुआ माईकल मंझा (ज़ालिम मंझा) कैद है।
माईकल अपनी बेड़ियाँ तोड़कर आजाद होता है और अपनी ट्रेडमार्क चमकीली चेनशॉ (Chainsaw) लेकर हवेली के शैतानों पर टूट पड़ता है।
कला और लेखन (Art & Storytelling)
- राइटिंग और डायलॉग्स: सुदीप मेनन का लेखन तेज-तर्रार है। हॉरर के बीच माईकल मंझा के कॉमिक टोन और कूल वन-लाइनर्स कहानी में बैलेंस बनाए रखते हैं।
- आर्टवर्क्स और कलर्स: मॉरिशियो का आर्टवर्क कमाल का है। एक्शन सीन्स, खौफनाक चेहरों के एक्सप्रेशन्स और डार्क-थीम कलर प्लेटिंग कॉमिक्स के माहौल को जीवंत बनाती हैं।
- हिंदी रूपांतरण: मंदार गंगोले का हिंदी सुलेख और लेटरिंग पढ़ने के अनुभव को और भी असरदार बनाता है।
क्यों पढ़ें ‘ज़ालिम मंझा: सेल नंबर 9’?
- फास्ट-पेस्ड एक्शन: कहानी कहीं भी सुस्त नहीं पड़ती और शुरुआत से अंत तक ग्रिप बनाए रखती है।
- यूनिक एंटी-हीरो: माइकल मंझा का कैरेक्टर पारंपरिक सुपरहीरो से अलग है—वह बेपरवाह, थोड़ा फ्लर्टी और पूरी तरह से डेडली है।
- नॉन-स्टॉप थ्रिल: अगर आपको गोर (Gore), स्लेशर (Slasher) और डार्क कॉमेडी पसंद है, तो यह अंक आपको निराश नहीं करेगा।
अंतिम निर्णय (Final Verdict)
ज़ालिम मंझा (अंक 1) इंडियन कॉमिक बुक इंडस्ट्री में हॉरर-एक्शन जोनर की एक बेहतरीन शुरुआत है। बुल्सआई प्रेस ने क्वालिटी और कंटेंट दोनों के मामले में बढ़िया काम किया है।
रेटिंग: 4/5 स्टार्स
किसे पढ़नी चाहिए: हॉरर, एक्शन और देसी कॉमिक्स के लवर्स के लिए मस्ट-रीड!






