

इंद्रजाल कॉमिक्स क्या थी? एक खाली प्रिंटिंग प्रेस से शुरू हुई कॉमिक्स की कहानी
भारतीय कॉमिक्स के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका महत्व सिर्फ उनकी कहानियों या किरदारों की लोकप्रियता तक सीमित नहीं है। इंद्रजाल कॉमिक्स भी ऐसा ही एक नाम है। आज Phantom, Mandrake या बहादुर के पुराने पाठकों के लिए इंद्रजाल कॉमिक्स एक याद है, लेकिन इसकी शुरुआत की कहानी अपने आप में काफी दिलचस्प है। इंद्रजाल किसी नए भारतीय सुपरहीरो को लॉन्च करने की योजना के रूप में शुरू नहीं हुई थी। इसके पीछे एक व्यावसायिक जरूरत थी—The Times of India समूह की महँगी printing presses का बेहतर इस्तेमाल करना। 1950 के दशक के अंत में Bennett, Coleman & Co. ने कुछ महँगी sheet-fed printing presses खरीदी थीं, जिनका इस्तेमाल साल के काफी हिस्से में नहीं हो पाता था और वे मुख्यतः calendar printing जैसे कामों के दौरान सक्रिय रहती थीं। इन्हीं presses को अधिक समय तक व्यस्त रखने के लिए comic books प्रकाशित करने का विचार सामने आया।
उस समय Times of India से जुड़े अनंत पाई इस विचार के महत्वपूर्ण हिस्से बने। शुरुआती सोच यह थी कि अमेरिका में लोकप्रिय Superman और Batman जैसी comics को भारतीय बाजार में reprint किया जाए। हालांकि, अनंत पाई को लगा कि भारत के पाठकों के लिए ऐसा character ज्यादा उपयुक्त होगा जिसकी कहानी किसी खास देश या शहर पर निर्भर न हो। उन्होंने Phantom को बेहतर विकल्प माना और इसी दिशा में आगे बढ़ने के बाद 1964 में Indrajal Comics की शुरुआत हुई। इसलिए इंद्रजाल की कहानी को केवल एक comic publication की शुरुआत के रूप में देखना अधूरा होगा; इसके पीछे printing technology, publishing business और भारतीय पाठकों के लिए अंतरराष्ट्रीय comic characters उपलब्ध कराने का एक साथ काम करता हुआ विचार था।
1964 में शुरू हुआ इंद्रजाल का सफर
Indrajal Comics का पहला अंक मार्च 1964 में प्रकाशित हुआ। इसे Bennett, Coleman & Co. ने प्रकाशित किया था और शुरुआती दौर में इसका मुख्य आकर्षण Phantom था। पहले 32 अंक Phantom की कहानियों पर आधारित थे। शुरुआती publication अंग्रेजी में था, लेकिन जल्द ही इंद्रजाल ने भारतीय भाषाओं के पाठकों तक भी अपनी पहुँच बढ़ानी शुरू कर दी। इसके साथ सामान्य ज्ञान और अन्य illustrated material भी प्रकाशित किया जाता था, इसलिए यह शुरुआत से ही केवल एक character की standalone comic book नहीं थी।
Phantom की लोकप्रियता इतनी मजबूत रही कि धीरे-धीरे इंद्रजाल कॉमिक्स और Phantom के नाम एक-दूसरे से जुड़ गए। हालांकि, इंद्रजाल का दायरा Phantom से कहीं बड़ा था। यह एक publishing title था, जिसके अंतर्गत अलग-अलग international comic-strip characters को भारतीय पाठकों तक पहुँचाया गया। यही कारण है कि इसके इतिहास को समझते समय इसे केवल “Phantom की भारतीय comics” कहना सही नहीं होगा।
Phantom के साथ दूसरे विदेशी किरदार भी आए
Phantom के बाद इंद्रजाल कॉमिक्स में Mandrake the Magician, Flash Gordon, Buz Sawyer, Rip Kirby और Garth जैसे कई दूसरे characters भी प्रकाशित हुए। ये मूल रूप से international syndicated comic strips से आए थे, जिन्हें भारतीय publishing market में इंद्रजाल के माध्यम से उपलब्ध कराया गया। उस समय आज जैसी global digital connectivity नहीं थी। किसी विदेशी character की नई कहानी या comic series तक नियमित पहुँच बनाना भारतीय पाठकों के लिए आसान नहीं था। ऐसे दौर में इंद्रजाल ने अंतरराष्ट्रीय comics और भारतीय पाठकों के बीच एक महत्वपूर्ण माध्यम का काम किया।
इंद्रजाल की एक और खासियत यह थी कि समय के साथ इसके editions भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध होने लगे। हिंदी के अलावा कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसके संस्करण प्रकाशित हुए। इससे इसका पाठक वर्ग केवल अंग्रेजी पढ़ने वाले शहरी पाठकों तक सीमित नहीं रहा। भारत जैसे बहुभाषी देश में किसी comic character को अलग-अलग भाषाओं में उपलब्ध कराना उसकी पहुँच बढ़ाने का महत्वपूर्ण तरीका था।
इंद्रजाल में आया भारतीय किरदार बहादुर
इंद्रजाल कॉमिक्स के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव तब आया जब इसमें बहादुर को जगह मिली। बहादुर को cartoonist और writer आबिद सुरती ने बनाया था और 1976 में वह इंद्रजाल का हिस्सा बना। Phantom, Mandrake और Flash Gordon जैसे characters के विपरीत बहादुर एक भारतीय original character था और उसकी कहानियों का सामाजिक तथा भौगोलिक संदर्भ भी भारतीय था।
बहादुर की मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे इंद्रजाल की पहचान सिर्फ विदेशी characters के भारतीय editions तक सीमित नहीं रही। हालांकि उसके publication का बड़ा हिस्सा अभी भी international syndicated characters पर आधारित था, लेकिन भारतीय creator द्वारा बनाए गए character को उसी platform पर जगह मिलना भारतीय comics के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
इंद्रजाल कितनी लोकप्रिय थी?
इंद्रजाल कॉमिक्स की लोकप्रियता का सबसे स्पष्ट संकेत उसका लंबा publication run है। 1964 से शुरू होकर यह series अप्रैल 1990 तक चली और इस दौरान कुल 803 अंक प्रकाशित हुए। उपलब्ध records के अनुसार इनमें 414 अंकों में Phantom की कहानियाँ शामिल थीं। कुछ अंकों का publication industrial strike के कारण प्रभावित भी हुआ था।
इसकी publication frequency भी समय के साथ बदलती रही। शुरुआत में इंद्रजाल monthly थी, फिर 1967 में इसे fortnightly किया गया और 1981 में weekly publication तक पहुँची। बाद में यह फिर fortnightly schedule पर लौट आई। इतने लंबे समय तक इतनी नियमित frequency के साथ publication जारी रहना बताता है कि उस समय इसका एक स्थायी पाठक वर्ग मौजूद था।
क्या इंद्रजाल को Indian Comics कहा जा सकता है?
यह सवाल आज भी दिलचस्प है और इसका जवाब थोड़ा जटिल है। इंद्रजाल एक भारतीय publication थी, लेकिन इसके सबसे प्रसिद्ध characters भारतीय मूल के नहीं थे। Phantom, Mandrake और Flash Gordon जैसे characters विदेशी creators और syndicates से आए थे और उन्हें भारतीय बाजार में प्रकाशित किया गया। इसलिए इन्हें Indian original comics कहना सही नहीं होगा।
दूसरी ओर, बहादुर जैसे character भारतीय creator द्वारा बनाए गए थे और भारतीय सामाजिक परिवेश से जुड़े थे। इसलिए इंद्रजाल को भारतीय comics publishing history का हिस्सा कहना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसके हर character को भारतीय original character कहना सही नहीं होगा। यह अंतर भारतीय comics के विकास को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में comics culture केवल Indian superheroes से शुरू नहीं हुआ था। विदेशी syndicated characters के भारतीय editions ने भी इस बाजार को आकार देने में भूमिका निभाई।
इंद्रजाल और भारतीय कॉमिक्स का बदलता दौर
इंद्रजाल के लंबे publication run के दौरान भारतीय comics landscape भी तेजी से बदल रहा था। Amar Chitra Katha भारतीय इतिहास, mythology और cultural stories को comics के माध्यम से प्रस्तुत कर रही थी। दूसरी तरफ बाद के वर्षों में Diamond Comics और Raj Comics जैसे publishers ने भारतीय characters और superheroes को अधिक प्रमुखता दी। इस बदलाव के बीच इंद्रजाल एक ऐसे दौर का प्रतिनिधित्व करती है जब भारतीय publishing industry international comic characters को स्थानीय पाठकों तक पहुँचाने के साथ-साथ धीरे-धीरे अपने original characters के लिए भी जगह बना रही थी।
इसी वजह से इंद्रजाल को भारतीय comics history में एक transitional publication के रूप में भी देखा जा सकता है। इसकी शुरुआत विदेशी characters से हुई, लेकिन इसके लंबे सफर के दौरान भारतीय comics readership और publishing ecosystem दोनों बदलते गए।
1990 में बंद हुआ इंद्रजाल का प्रकाशन
लगभग 26 वर्षों तक प्रकाशित होने के बाद 1990 में Indrajal Comics का प्रकाशन बंद हो गया। इसके बाद Phantom और Mandrake जैसे characters भारतीय बाजार से पूरी तरह गायब नहीं हुए। अलग-अलग publishers ने बाद के वर्षों में इन characters को प्रकाशित किया और भारतीय पाठकों के साथ उनका रिश्ता जारी रहा।
लेकिन इंद्रजाल का अपना दौर समाप्त हो चुका था। 1990 तक भारतीय comics market पहले जैसा नहीं रहा था। नए publishers, नए characters और storytelling के नए तरीके सामने आ रहे थे। भारतीय comics धीरे-धीरे अपने original heroes और local stories की ओर भी बढ़ रही थी।
इंद्रजाल कॉमिक्स की विरासत
आज इंद्रजाल कॉमिक्स को याद करने का सबसे आसान कारण nostalgia है। पुराने पाठकों के लिए Phantom, Mandrake और बहादुर की कहानियाँ बचपन की यादों से जुड़ी हुई हैं। लेकिन इंद्रजाल की विरासत को सिर्फ nostalgia तक सीमित करना इसके इतिहास को छोटा करके देखना होगा।
इस publication ने भारत में comic-book readership के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने international characters को भारतीय पाठकों तक पहुँचाया, उन्हें कई भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया और बाद में बहादुर जैसे भारतीय character के लिए भी जगह बनाई। इससे यह भी पता चलता है कि भारतीय comics industry की शुरुआत किसी एक publisher या किसी एक genre से नहीं हुई थी। इसके पीछे syndicated international comics, Indian publishing houses, local-language editions और धीरे-धीरे विकसित होता readership ecosystem—इन सभी की भूमिका रही।
सबसे दिलचस्प बात शायद इसकी शुरुआत ही है। एक publishing company के पास मौजूद महँगी printing presses को व्यस्त रखने की जरूरत से निकला विचार आगे चलकर 803 अंकों और लगभग 26 वर्षों के सफर वाली comics series बन गया। इंद्रजाल कॉमिक्स इसलिए भारतीय comics history में सिर्फ Phantom की वजह से याद रखने लायक नहीं है, बल्कि इसलिए भी कि यह उस समय की publishing industry और भारत में विकसित होती comics culture के बीच का एक महत्वपूर्ण पुल थी।
